Alankar in Hindi Grammar : अलंकार की परिभाषा प्रकार एवं उदाहरण

   alankar in hindi grammar
Alankar in Hindi Grammar : हिंदी व्याकरण में अलंकार की परिभाषा, Alankar kise kahate hain ? प्रकार (भेद) एवं उदाहरण से विभिन्न परीक्षाओ में प्रश्न पूछे जाते है। 
ऐसे में हमें इसकी विस्तृत जानकारी होना आवश्यक है। हिंदी व्याकरण में अलंकार का एक महत्वपूर्ण स्थान है। 
इसके प्रयोग से काव्य की शोभा में वृद्धि होती है। प्रतियोगी परीक्षा को ध्यान में रखते हुए हम इस लेख में Alankar kise kahate hain की विस्तृत जानकारी प्राप्त करेंगे। 

Alankar in Hindi Grammar :

वाक्यांश की आकृति उनकी प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए, शब्दों के उपयोग से जो बदलाव होता है। Alankar कहलाता है। 

संस्कृत के अलंकार-सम्प्रदाय के प्रतिस्थापक आचार्य दांडी के शब्दों में " काव्यशोभाकारान धर्मान अलंकारन प्रचक्षते" . 

अर्थात Hindi Varnamala में  "काव्य की शोभा बढ़ाने वाले कारक गुण को अलंकार कहते है"। 

Alankar ki Paribhasha :

शब्द और उसके अर्थ की शोभा बढ़ाने वाले गुण (जिस गुण के द्वारा उपमेय तथा उपमान में समानता बताई जाय) को अलंकार कहते है। 

अलंकरोति इति अलंकार : काव्य की शोभा बढ़ाने वाले गुण को अलंकार कहते है। 

आचार्य  रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार " भावो को उत्कर्ष दिखाने और शब्दों के रूप, गुण और क्रिया का तीव्र अनुभव कराने वाली उक्ति Alankaar कहलाती है"।  

अलंकार के भेद :

अलंकार के भेद
 
हिंदी व्याकरण में अलंकार के कुल तीन भेद होते है। 
  1. शब्दालंकार (Shabdalankar)
  2. अर्थालंकार (Arthalankar)
  3. उभयालंकार (Ubhyalankar) 
 हिंदी के कई प्रशिद्ध विद्वान् Alankaar के मुख्यतः दो ही भेद मानते है।  वे लोग उभयालंकार (Ubhyalankar) को ज्यादा महत्व नहीं देते है। 

 (१) शब्दालंकार (Shabdalankar) :

जहाँ शब्दों के द्वारा काव्य में सौन्दर्य या चमत्कार उत्पन्न होता है, वहां शब्दालंकार (Shabdalankar) होता है। 
 उदाहरण - चारु चंद्र की चंचल किरणे, खेल रही थी जल थल में।
 
शब्दालंकार के निम्न भेद या प्रकार होते है। 
  • अनुप्रास (Anupras)
  • यमक (Yamak)
  •  श्लेष (Shlesh)
  • वक्रोक्ति (vakrokti)
  • वीप्सा (Vipsa) 

  अनुप्रास अलंकार ( Anupras Alankar kise kahate hain ):

   जहाँ पर शब्दों में एक ही वर्ण (समान वर्ण) की आवृति एक से अधिक बार प्रयोग में हो तो वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। 

अनु+प्रास = बार-बार+वर्ण/अक्षर 

नोट - वर्णो की आवृति में स्वरों का समान होना अनिवार्य नहीं होता।  

उदाहरण -  सो सुख सुजस सुलभ मोहिं स्वामी। 

इसमें "स" वर्ण की आवृति पांच बार हुई है। लेकिन स्वरों का मेल केवल तीन स्थानों (सुख,सुजस,सुलभ) पर हुआ है।

 अनुप्रास (Anupras Alankaar) के मुख्यतः चार भेद होते है। 

  1. छेकानुप्रास (Chhekanupras) 
  2. वृत्यनुप्रास  (Vrityanupras)
  3. लाटानुप्रास (Latanupras)
  4. अंत्यानुप्रास (Antyanupras)

 १- छेकानुप्रास (Chhekanupras) :

छेक शब्द का अर्थ  "चतुर" होता है।   जब वाक्य में किसी एक वर्ण या वर्ण समूह के स्वरूप और क्रम से उनकी आवृति केवल एक बार हो तो वहां छेकानुप्रास होता है। 

इसमें व्यञ्जनवर्णो का उसी क्रम में प्रयोग अनिवार्य है। जैसे "रस" और "सर" में छेकानुप्रास नहीं है। जबकि सर-सर में वर्णो की आवृति उसी क्रम और स्वरुप में हुई है, अतः यहाँ छेकानुप्रास है। 

उदाहरण : बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।
यहाँ पद, पदुम में "प" "द" और सुरूचि, सरस में 'स' 'र' की क्रमतः एक बार आवृति हुई है।

२- वृत्यनुप्रास (Vrityanupras) :

 जहाँ किसी पद में एक वर्ण/वर्ण समूह की आवृति दो या दो से अधिक बार हो, वहां वृत्यानुप्रास होता है।

उदाहरण -  तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।                                                                         यहाँ 'त' वर्ण की आवृति कई बार हुई है, अतः यह वृत्यनुप्रास है। 

 ३- लाटानुप्रास (Latanupras) :

 जब एक शब्द या वाक्य की आवृति दुबारा उसी अर्थ में हो, पर तात्पर्य या अर्थ में परिवर्तन हो जाए।लाटानुप्रास कहलाता है। 

उदहारण - १- पंकज तो पंकज, मृगांक भी है मृगांक री प्यारी।
2- मिली न तेरे मुख की उपमा, देखी वसुधा सारी।।

पहले वाक्य में पंकज और मृगांक की आवृति हुई है। जहाँ पंकज शब्द का अर्थ सामान्य कमल है।
वहीँ दूसरे पंकज का अर्थ कीचड़ में उत्पन्न विशेषताहीन कमल से है। निचले वाक्य में पहले मृगांक का अर्थ चन्द्रमा है। जबकि दूसरे मृगांक का अर्थ कलंकादियुक्त चन्द्रमा है। 

नोट - लाटानुप्रास यमक का ठीक उल्टा होता है। इसमें मात्र शब्दों की आवृति न होकर तात्पर्य मात्र के भेद से "शब्द और अर्थ" दोनों की आवृति होती है। 

 ४- अंत्यानुप्रास (Antyanupras) :

जब वाक्य के प्रत्येक पंक्ति के अंतिम वर्ण या मात्राओ की आवृति के कारण तुकांतता बनती हो तो वहां अंत्यानुप्रास होता है। 

उदाहरण : 1- रघुकुल रीति सदा चली आई।  प्राण जाय पर वचन न जाई।।                                                                2- जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिहु लोक उजागर।।

यहाँ पहले उदाहरण में "आई और जाई" जबकि दूसरे में  "सागर और उजागर" में पद मैली होने से अंत्यानुप्रास है।                         

 यमक (Yamak Alankar) :

जहाँ एक ही शब्द की आवृति दो या दो से अधिक बार हो, और उनके अर्थ भी प्रत्येक स्थान पर भिन्न हो , यमक अलंकार कहलाता है। 

उदाहरण - १- कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय। उहि खाये बौरात नर , इहि पाये बौराय।।      यहाँ कनक शब्द के दो अर्थ (पहला- धतूरा, दूसरा-सोना) है। 

2 - काली घटा का घमंड घटा।                                                                                                                 यहाँ घटा के दो अर्थ (मेघ,कम होना) है। 

श्लेष अलंकार (Shlesh Alankar kise kahate hain ) :

 जब शब्द का प्रयोग एक बार हो लेकिन उसका कई अर्थ हो (अनेक) , उसे श्लेष अलंकार कहते है। 
श्लेष का शाब्दिक अर्थ ''चिपका हुआ'' होता है। अर्थात जहाँ पर एक ही शब्द में कई अर्थ चिपके हुए हो श्लेष कहलाता है। 
उदहारण -रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून। 
               पानी गए न ऊबरै मोती, मानस चून।।
यहाँ पानी शब्द के तीन अर्थ - चमक, प्रतिष्ठा और जल है। 

श्लेष अलंकार के भेद :

हिंदी व्याकरण में Shlesh Alankaar के दो भेद होते है। 
  1. शब्द श्लेष (Shabd Shlesh)
  2. अर्थ श्लेष (Arth Shlesh)
 शब्द श्लेष (Shabd Shlesh) में एक ही शब्द के विभिन्न अर्थ होते है। जबकि अर्थ श्लेष (Arth Shlesh) में शब्द का एक ही अर्थ होता है जो दो या दो से अधिक पक्षों में लागू होता है।   

अर्थालंकार ( Arthalankar ) :

''जहाँ शब्दों के अर्थ के कारण काव्य में सौंदर्य और चमत्कार दिखाई पड़ता है , वहां अर्थालंकार होता है''। 
यहाँ एक शब्द के बदले उसके पर्यावाची शब्द का प्रयोग करने से भी उसका अर्थ परिवर्तित नहीं होता। 
जैसे - उदित उदय गिरी मंच पर,रघुवर बाल पतंग। 
विकसे संत सरोज मुख, हरखे लोचन भृंग।।

हिंदी व्याकरण में अर्थालंकार (Arthalankar) के कई भेद होते है। जो निम्नलिखित है -
  •  उपमा 
  • रूपक 
  • उत्प्रेक्षा 
  • अतिश्योक्ति 
  • भ्रांतिमान 
  • विरोधाभास 
  • विभावना 
  •  लोकोक्ति 
  • उदाहरण 
  • प्रतीप 
  • संदेह 
  • अपनहुति 
  • उल्लेख 
  • दीपक 
  • दृष्टांत 
  • व्यतिरेक 
  • निदर्शना 
  • अन्योक्ति 
  • समासोक्ति 
  • असंगति 
  • अर्थान्तरन्यास  
  • मानवीकरण 

उपमा अलंकार (Upma Alankar kise kahate hain) :

 उपमा दो शब्दों से मिलकर बना है - उप (समीप) + मा (मापना/तौलना) . 
अर्थात उपमा का शाब्दिक अर्थ  "दो वस्तुओ को एक दूसरे के पास (नजदीक) रखकर मापना/तौलना" होता है। 
जब किन्ही दो वस्तुओ में रूप, रंग, गुण, क्रिया और  स्वभाव के कारण समानता या तुलना की जाय, तो वहां उपमा अलंकार होता है। 

उदाहरण - श्री कृष्ण का मुख चन्द्रमा के सामान है।  

उपमा (Upma Alankaar) के चार अंग होते है। 

  1. उपमान - जिस वस्तु की उपमा दी जाती है। 
  2. उपमेय - जिसकी उपमा दी जाए अर्थात जिसका वर्णन हो रहा है। 
  3. वाचक - वह शब्द जिससे उपमेय और उपमान में समानता प्रदर्शित की जाए। 
  4. साधारण धर्म - जिस गुण - क्रिया आदि की समानता जहाँ दिखाई जाती है। 
उदाहरण  - श्याम का मुख कमल के समान सुन्दर है। 

उपमेय - श्याम का मुख।
उपमान - कमल।
वाचक - समान।
साधारण धर्म - सुन्दर।

रूपक अलंकार (Roopak Alankar kise kahate hain ):

 जहाँ उपमेय और उपमान में कोई अंतर दिखाई न पड़े अर्थात उपमेय को उपमान का रूप मान लिया जाए। वहां रूपक अलंकार होता है। 
उदाहरण - समय सिंधु चंचल है भारी। 
रूपक (Roopak Alankaar) के तीन भेद होते है। 
  1. सांग रूपक (Sang Roopak) - जहाँ उपमेय के अवयवों पर उपमान के अवयवों का आरोप किया जाए। 
  2. निरंग रूपक (Nirang Roopak) - जहाँ केवल उपमेय पर उपमान का आरोप हो, अंगो का नहीं। 
  3. परंपरित रूपक (Parnparit Roopak) - जिसमे एक आरोप दूसरे आरोप का कारण हो। 

उत्प्रेक्षा (Utpreksha Alankar) :

जब उपमेय में (उपमान से भिन्नता होते हुए भी) उपमान की सम्भावना व्यक्त की जाती है , उत्प्रेक्षा अलंकार कहलाता है। 
उदाहरण  - सोहत ओढ़े पीत पट स्याम सलोने गात। 
मनो नील मनि शैल पर आतप परयो प्रभात।।

हिंदी व्याकरण में उत्प्रेक्षा के निम्न तीन भेद होते है। 
  1. वस्तूत्प्रेक्षा - 
  2. हेतूत्प्रेक्षा -  
  3. फलोत्प्रेक्षा 

अतिशयोक्ति (Atishyokti) अलंकार  :

 जब किसी व्यक्ति या वस्तु की  प्रशंसा इतनी बढ़ा चढ़ा कर की जाए की वह वास्तव में संभव ही न हो, अतिश्योक्ति अलंकार कहलाता है। 
उदाहरण  - पानी परात को हाथ छुओ नहीं, नैनन के जल सो पग धोयो। 
 
अतिश्योक्ति (Atishyokti) के छह मुख्य भेद होते है। 
  1. रूपकातिशयोक्ति 
  2. भेदकातिश्योक्ति 
  3. असंबंध्तिश्योक्ति 
  4. सम्बन्ध्तिश्योक्ति 
  5. अकर्मातिशयोक्ति 
  6. अत्यंततिशयोक्ति 

उल्लेख अलंकार :

जहाँ एक ही वस्तु का वर्णन अनेक प्रकार से किया जाये, वहाँ उल्लेख अलंकार होता है। 
उदाहरण  - तू रूप है किरन में, सौंदर्य है सुमन में। 
तू प्राण है पवन में, विस्तार है गगन में। 
तू ज्ञान हिन्दुओ में, ईमान मुस्लिमो में। 
तू प्रेम क्रिश्चियन में, है सत्य तू सूजन में।।
उल्लेख अलंकार दो प्रकार के होते है। 
  1. ज्ञातृभेद 
  2. विषय भेद 

Bhrantiman Alankar Kise Kahate hain  :

"जहाँ सादृश्य के कारण किसी वस्तु में दूसरी वस्तु का भ्रम हो, वहां भ्रांतिमान अलंकार होता है"। 
भ्रान्ति Alankaar वही माना जायेगा जहाँ पर कवि-प्रतिभा द्वारा भ्रान्ति उत्पन्न की जाएगी। 
सीप में चांदी या रज्जु सर्प भ्रान्ति अलंकार नहीं है। 

उदाहरण - नाक का मोती अधर की कांति से। 
बीज दाड़िम का समझकर भ्रान्ति से। 
देखकर सहसा हुआ शुक मौन है। 
सोचता है अन्य शुक यह कौन है।
उपरोक्त पंक्ति में तोते और अनार के दाने को लेकर भ्रम उत्पन्न हुआ है अतः यहाँ Bhrantiman है। 

संदेह अलंकार :

जहाँ उपमेय और उपमान में समता देखकर यह सुनिश्चित नहीं हो पाता कि कौन उपमेय है और कौन उपमान अर्थात संदेह बना रहता है।  वहां संदेह अलंकार होता है। 

उदाहरण - सारी बीच नारी है, कि नारी बीच सारी है। 
कि सारी ही की नारी है, कि नारी ही की सारी हैं। 
यहाँ सारी (वस्त्र) और नारी (महिला) को लेकर संदेह बना हुआ है अतः यहाँ Sandeh Alankaar है। 

 व्यतिरेक अलंकार :

जहाँ उपमेय में उपमान की अपेक्षा कुछ विशेषता बताई जाए, वहां व्यतिरेक अलंकार कहते है। 
उदाहरण  - संत ह्रदय नवनीत समाना, कहा कविन पै कहत न जाना। 

 हिंदी व्याकरण में व्यतिरेक के चार भेद होते है। 
  1.   उपमेय के उत्कर्ष और उपमान के अपकर्ष का कारण बताकर। 
  2. केवल उपमेय के अपकर्ष का कारण बताकर। 
  3. केवल उपमान के अपकर्ष का कारण बताकर। 
  4. उपमेय के उत्कर्ष व उपमान के अपकर्ष का कारण बताकर। 

 प्रतीप अलंकार : 

प्रतीप का शाब्दिक अर्थ उल्टा या विपरीत होता है। इसे उपमा (Upma) का विपरीत माना जाता है। 
इसमें उपमान को को उपमेय के सामान कहा जाए अथवा उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ कहा जाए, वहां प्रतीप अलंकार होता है। 
उदाहरण  -  सीता का मुख चन्द्रमा के समान सुंदर है। (उपमा)
सीता के मुख के समान चन्द्रमा है। (प्रतीप )

विरोधाभास अलंकार :

जब दो विरोधी वस्तुओ का संयोग एक साथ दिखाया जाए, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है। 
उदाहरण  - सुलगी अनुराग की आग वहां, जल से भरपूर तड़ाग जहाँ। 
यहाँ जल और आग दो परस्पर विरोधी पदार्थ का संयोग एक साथ दिखाया गया है, अतः यहाँ विरोधाभास Alankaar है। 
इसे कई प्रशिद्ध हिंदी जानकारों ने Virodh Alankaar नाम से भी उल्लेखित किया है। 

दृष्टान्त अलंकार :

 जहाँ पहले कोई बात कह कर, उससे मिलती जुलती बात द्वारा दृष्टान्त दिया जाय, लेकिन समानता किसी शब्द द्वारा प्रकट न हो , वहां दृष्टान्त अलंकार होता है। 
नोट- जहाँ उपमेय और उपमान तथा उनके साधारण धर्मो में भाव साम्य हो। 

उदाहरण  - रहिमन अँसुआ नयन ढरी, जिय दुःख प्रकट करेइ। 
         जाहिं निकारो गेह ते, कस न भेद कहिं देइ।।
 उपर्युक्त उदाहरण में साधारण धर्म - मन के दुःख को प्रकट करना तथा भेद खोल देना अलग-अलग है किन्तु दोनों में समानता है। 
यहाँ सादृश्यमूलक किसी शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है अतः यह दृष्टान्त है। 

असंगति अलंकार :

जब कारण और कार्य अलग-अलग स्थानों पर घटित होते दिखाई पड़े तो वहां असंगति अलंकार होता है।
असंगति का शाब्दिक अर्थ - संगत के विना (आभाव) . 
इसमें कारण और कार्य की संगती नहीं पायी जाती है। 
उदहारण - आये थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास। 
यहाँ कार्य करने के लक्ष्य (हरी भजन) और वास्तविक कार्य में असंगति है। 

उपमेयोपमा अलंकार 

जहाँ उपमेय और उपमान को परस्पर एक दूसरे का उपमान-उपमेय बना दिया जाय वहां उपमेयोपमा अलंकार होगा। 
उदहारण - राम के समान सम्भु, शम्भू सम राम है। 
उपरोक्त में राम और सम्भु को परस्पर  एक दुसरे के समान बतया गया है, अतः यहाँ उपमेयोपमा है। 

अर्थान्तरन्यास अलंकार 

जहाँ सामान्य कथन का विशेष कथन से या विशेष का सामान्य कथन से समर्थन किया जाए , वहां अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है। 
उदाहरण - जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंगा।
चन्दन विष व्याप्त नहीं लपटे रहत भुजंग।। 

अलंकार याद करने व समझने की ट्रिक :

  प्रतियोगी परीक्षा के इस दौर में बेसिक ज्ञान के साथ साथ ट्रिकी ज्ञान का होना बेहद आवश्यक है।  ट्रिकी माध्यम से प्रश्नो को हल करके परीक्षा में काफी समय बचाया जा सकता है। 
प्रतियोगी परीक्षा में अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण Alankar Trick in Hindi निम्न है। 
  

Alankar

याद करने व समझने की Trick

शब्दालंकार

शब्द के दवारा चमत्कार हो

अर्थालंकार

अर्थगत चमत्कार उत्पन्न हो

अनुप्रास

जहाँ वर्णों की आवृति बार बार हो

छेकानुप्रास

एक वर्ण दो बार आए

वृत्यानुप्रास

एक या अनेक वर्ण की आवृति कई बार हो

यमक

एक शब्द की आवृति दो या दो से अधिक बार हो तथा उनके अर्थ भी अलग अलग

श्लेष

शब्द एक ही बार प्रयोग हो किन्तु उनके अर्थ अनेक हो

उपमा

एक वस्तु की तुलना दुसरे वस्तु से की जाए ( समान ,अस,जस,सा,सी,ज्यो,सम शब्द)

रूपक

योजक चिन्ह (-) लगा हो

उत्प्रेक्षा

मनु, मनो, मनौ, जनु, जानो,जानहु, इन मेरे शब्द लगे हो

अतिश्योक्ति

किसी वस्तु को अत्यंत बढ़ाचढ़ा कर पेश किया जाए जो वास्तव में संभव न हो

 

Alankar in Hindi Grammar FAQ's 2022 :

 अलंकर की परिभाषा, Alankar kise kahate hain , भेद, प्रकार एवं उदाहरण से विभिन्न प्रतियोगी परीक्षा में प्रश्न पूछे जाते है. हिंदी व्याकरण में अलंकार को काफी महत्व दिया जाता है। 
उपरोक्त लेख में हमने इसकी विस्तृत जानकारी प्राप्त की।  यहाँ हम विभीन्न प्रतियोगी परीक्षाओ में पूछे गए कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों को जानेगें।

अलंकार किसे कहते हैं (alankar kise kahate hain) ?

 alankar kise kahate hain
शब्द और उसके अर्थ की शोभा बढ़ाने वाले गुण (जिस गुण के द्वारा उपमेय तथा उपमान में समानता बताई जाय) को अलंकार कहते है।
अलंकरोति इति अलंकार : काव्य की शोभा बढ़ाने वाले गुण को अलंकार कहते है।

अलंकार कितने प्रकार के भेद होते हैं ?

हिंदी व्याकरण में अलंकर मुख्यतः दो प्रकार के होते है। 
 १- शब्दालंकार 2- अर्थालंकार।
किन्तु कुछ विद्वान उभयालंकार तथा आधुनिक या पाश्चात्य को भी अलंकार की श्रेणी में मानते है। 

मानवीकरण (Manvikaran Alankar) को उदाहरण द्वारा समझाइए :

पद्य में आए हुए प्रकृति पशु पक्षी अथवा निर्जीव पदार्थ में मानवी गुणों के आरोपण से मानवीकरण अलंकर होता है।
उदाहरण - फूल हँसे, कलियाँ मुसकाइ।
उपरोक्त में फूलों का हंसना, कलियों का मुस्कराना मानवीय कल्पना है।

काली घटा का घमंड घटा में कौन सा अलंकार है

उपरोक्त पंक्ति " काली घटा का घमंड घटा" में यमक अलंकार है। क्यूंकि जहाँ एक ही शब्द की आवृति दो या दो से अधिक बार हो, और उनके अर्थ भी प्रत्येक स्थान पर भिन्न हो , यमक अलंकार कहलाता है।

उपरोक्त पंक्ति में घटा शब्द का प्रयोग दो बार हुआ है, और उनके अर्थ भी प्रत्येक स्थान पर भिन्न है। जहाँ पहले घटा का अर्थ बदलो के समूह से है वही दूसरे घटा का प्रयोग कम होने से है। 

चरण कमल बंदों हरि राइ ' में कौन सा अलंकार है

''चरण कमल बंदो हरि राइ'' में रूपक अलंकार है। क्यूंकि जहाँ उपमेय और उपमान में कोई अंतर दिखाई न पड़े अर्थात उपमेय को उपमान का रूप मान लिया जाए। वहां रूपक अलंकार होता है। 
उपरोक्त पंक्ति में चरण (पैर) को कमल (पुष्प) के सामान बताया गया है। 

उपरोक्त लेख में हमने Alankar Kise kahate hain? अलंकार की परिभाषा, भेद, प्रकार एवं उदाहरण की विस्तृत जानकारी प्राप्त की। जिससे आपको विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओ में हमारी राजभाषा (Hindi Grammar) से पूछे जाने वाले प्रश्नो को हल करने में सुविधा होगी। 
यदि आपके मन में अभी भी Alankar in Hindi Grammar से जुड़ा कोई प्रश्न या सुझाव हो तो हमें जरूर बताये। 

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